पुरातात्ववीक दृष्टिकोण से अंचल द्वारा किये गये कार्य का विवरण (Recent Activities)


हाल ही में पुरातात्ववीक दृष्टिकोण से अंचल द्वारा किये गये कार्य का विवरण (Recent Activities)

राँची अंचल द्वारा 2011 -12 में पथरौल, करो, जिला देवघर एवं पोड़ेयाहाट (पदमपुर) जिला गोड्डा का पुरातात्वीक दृष्टिकोण सर्वे किया गया जिसका आवलोकन इस प्रकार है।

पथरौल जिला देवघर

पथरौल गाँव, झारखण्ड की राजधानी रांची से उत्तार पूर्व दिशा में 275 कि.मी. दुर एवं जिला देवघर से 60 कि.मी. दुरी पर स्थित है। अक्षांतर 24° 14’ 68” ऊत्तर एवं 86° 42’ 93” पूर्व देशान्तर) पथरौल गांव पुलिस थाना कौख अंचल जिला देवघर में स्थित है। पथरौल गांव में स्थित काली मंदिर के अतिरिक्त दुर्गा, सरस्वती मणषा, शिव-पार्वती, राधा कृष्ण, रामलक्ष्मण एवं सूर्य के आधूनिक मंदिर एवं मूर्तियों से मंदिर परिसर सुसजीत हैं इनमें से प्रमुख मंदिर महाकाली का हैं जिसका निर्माण 18-19वीं शताब्दी का प्रतीत होता हैं स्थानीय एवं बाहरी लोग यहां पूजा-अर्चना करने लगे है।

मंदिर के पश्चिमी दिशा में टीले का प्रमाण मिला है। टिले का परिसर लगभग 150x100 मीटर का है तथा टिले का ऊंचाई लगभग 1 मीटर की है।

टिले के अधिकतर भाग में ग्रामीणो द्वारा उंचे-पक्के मकान बनाये गये हैं। टिले के उत्तार दिशा में तलाब है। जो ठाकूरबंद के नाम से जाना जाता है।

टिले के उपरी भाग में लाल एवं लाल-काले रंग के मृदभांड के अवशेष बिखरे पड़े हैं मृदभांड से ज्ञात होता है कि पथरौल गांव उत्तर-मध्य काल में बसा होगा। बड़े आकार तथा मध्य आकार के मटके, हांड़ी, थाली एवं कटोरे आदि मृदयांद के अवशेष प्रमूख है।

कारो, जिला देवघर

कारो (देशान्तर 86° 44', 821'' पूर्व अक्षान्तर 24° 07', 455'' उत्तरी) गांव झारखण्ड से रांची षहर से उत्तार-पूर्वी दिशा में 220 कि.मी. तथा जामताड़ा से उत्तार दिशा में लगभग 21 कि.मी. की दूरी पर अवस्थित हैं क्षेत्रीय ग्रामीणों द्वारा पता चला कि कारो का प्राचीन नाम कर्णपूर था। निरीक्षण के दौरान कारो गांव के आसपास कई छोटे-बड़े तालाब देखे गये इनमें कासासार तथा चाकूसर प्रमूख है चाकूसर तालब के मध्य में बलुआ पत्थर से निर्मित पिलर है जिसका आकार गोलाकार है स्तंभ के उपरीभाग में मूर्ती है।

कर्णेश्वर मंदिर का निरीक्षण किया गया यह मंदिर गांव के मध्य भाग में है, मंदिर के परीसर में आमलक, लिंग, योनीपीठ तथा मंदिर के भग्ना आवशेष रखे है जो 12वीं -13वी शताब्दी का संकेत देते है। गांव के उत्तारी दिशा में ईटों से बना हुआ एड छोटा सा मंदिर है जो मूरकटा काली मंदिर से जाना जाता है। मंदिर के गर्भगृत में भगवान बुध्द की मूर्ति ध्याण मुद्रा में है, मुर्ति का उत्तरी भाग खंडित है, जो मूरकटा काली के नाम से पूजा जाता है।

शिवलिंग तथा विष्णु की मूर्ति अर्जून मेमोरियल स्कूल के प्रांगण में रखी है, विष्णु की मूर्ति खंडित हैं मूर्ति के परीक्षण से ज्ञान होता है कि यह उत्तार मध्य काल की होगी।

पडैयाहाट जिला गोड्डा

पडेयाहाट (पदमपूर) अक्षांतर 24° 41' 54' उत्तर एवं 87° 08' 20'' पूर्व देशान्तर) झारखण्ड के राँची शहर के उत्तार पूर्व दिशा में 230 कि.मी. तथा देवघर से 67 कि.मी. एवं पडैयाहाट के पश्चिमी दिशा में 6 कि.मी. दूरी पर स्थित है। यह गांव जिला-गोड्डा अंचल पडैयाहाट, पुलिस थाना पडैयाहाट पदमपूर, गांव मौजा हरलीरकट पंचायत धू्रपद के अंतर्गत चिर नदी के दाहिने तट पर स्थित है।

पदमपूर स्थित प्राचीन तालाब के पश्चिमी दिशा में प्राचीन मंदिर के भाग्नाअवशेष बिखरे पड़े हैं, जिनमें मंदिर के स्तम्ब तथा पके ईटों के (19x14x4.5,15x15x5 से.मी.) अवशेष मिले हैं प्राचीन मंदिर के उपर ही नया शिव मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर परिसर में पिपल के पेड़ के नीचे शिला लेख (66x46x20 से.मी.) है। शिलालेख से ज्ञात होता है कि यह 12-13वीं शताब्दी का रहा होगा।

तालाब के पूर्वी दिशा में प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष बिखरे पड़े है तथा मंदिर का नवनिर्माण प्राचीन ईटों से किया गया है। मंदिर के गर्भगृह में महीषाषूर मर्दानी की मूर्ति रखी है, र्वमूर्लीकल से ज्ञात होता है कि यह 12-13 की शताब्दी की है।

तालाब के आरी दिशा में पत्थर से निर्मित सिढ़ीयाँ तथा घाट जो तालाब की ओर जाता है, जिसकों स्थानीय लोग राजा के घाट के नाम से जानते है। तालाब के पूर्वी दिशा में ईटों से निर्मित मकान के भग्नावशेण मिले है। इसमें ज्ञात होता है कि चिर नदी दाहिने तटपर स्थित पदमपूर गांव 12-13 वीं शताब्दी की छोटी सी आबादी वाले गांव रहा होगा। मकान के अवशेष बहुत की कम बचे है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राँची अंचल द्वारा सन् 2011-2012 में चतरा, जिला स्थित इटखोरी का उत्खनन किया गया। यह स्थल रांची से लगभग उत्तार-पूरब 150 कि.मी. की दूरीपर स्थित हैं उत्खनन में स्तूपों के अवशेष प्राप्त हुए है। उत्खनन में पत्थर निर्मीत बुद्व की मूर्तियां किर्तिमूख, मनैती स्तूप, पके मिट्टी के किलकिता सिलिंग बॉल, मूर्ति, लोहे के किल, चाकू, तिर, हसीयां तांबेकीचूडिया के अवशेष, पके मिट्टी के लाल रंग के घड़े, कटोरें, टोटीदार लोटा, दिपक आदि प्रमूख हैं प्राप्त अवशेषों के अनुसार यह स्थान 9वीं 10वीं शताब्दी का है।