उत्खनन् एवं अनवेशण


भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राँची अंचल द्वारा किये गये वैज्ञानिक सफाई/उत्खनन एवं अनवेषन का संक्षिप्त ब्योरा निम्नलिखित है।

बेनीसागर (अक्षांश 29° 59° 01-N देषान्तर 85° 53’’39’ E) यह स्थल झारखंड के मछगाँव प्रखंड, जिला प. सिंहभूम में स्थित है। बेनीसागर/बेनूसागर, बेनू राजा के नाम से जाना जाता है, बेनू राजा ने विशाल तालाब का निर्माण किया था। तालाब लगभग 300x340 मीटर का है। तालाब एवं बेनीसागर के भग्नावशेषांक का प्रथम निरीक्षण कोलेनेट टिकेल ने ई. सन् 1840 में किया था। श्रीमान बेगलर ने 1875 में इस स्थल का निरीक्षण किया। भग्नावशेष के आधार पर स्थल की तिथि सातवीं शताब्दी तक रखी गयी है। स्थानीय परंपरा के अनुसार तालाब का निर्माण बेनू राजा ने किया था, किंतु पुरातात्विक दृष्टीकोण से अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिला कि तालाब का निर्माण वास्तव में किसने किया।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, राँची अंचल द्वारा सन् 2006 से 2011 तक तालाब के दक्षिण दिशा में वैज्ञानिक सफाई/उत्खनन किया गया है। उत्खनन में सूर्य, लकूलीस, ब्रम्हा, वायु, शिव-पार्वती, हनूमान, लज्जा गौरी, कुबेर, गणेश, शिव लिंग पके मिट्टी एवं पत्थर के मनके लोहे के तीर, चाकू, भाले, अंगूठी, कानकी बाली आदि प्रमुख है। तीन पके मिट्टी के मूहर के छाप मिले हैं, जिसमें चैतण्य प्रभू स्वामी'' लिखा है, चैतण्य प्रभू गणेशजी से संबंधित है। लिपी ब्राम्ही एवं भाषा संस्कृत है, जो छठी शताब्दी का संकेत देते है। बेनीसागर से पत्थर की एक मुहर मिली है। मुहर में शिलालेख ''प्रिंयगु ध्येयम च्चतुरविधा'' शिलालेख में ब्राम्ही की लिखावट और भाषा संस्कृत है, जो पाँचवी सदी की हो सकती है।

उत्खनन में मंदिरो के भग्नावशेष प्राप्त हुए है, मंदिर का निर्माण ईंट तथा चूने में किया गया है। ईंट का आकार 36x23 x7 से.मी. 36 x 27 x 6 सें.मी. 37 x 24 x 7 सें. मीटर का है। मंदिर छोटे आकार का है, जिसमे गर्भगृह, मंडप एवं प्रदक्षिणा पथ है। उत्खनन में छोटे बडे आकर के 32 शिव लिंग मिले हैं। इतनी बड़ी मात्रा में शिव लिंग का मिलना यह संदेश देता है कि शिवभक्त यहाँ अधिक मात्रा में रहे होगें।

शिव मंदिर खेकपरना जिला, लोहरदगा की वैज्ञानिक सफाई/उत्खनन शिव मंदिर, खेकपरना रांची से उत्तार पश्चिम दिशा में लगभग 40 कि.मी. दूरी पर है। मंदिर के पश्चिम दिशा में वैज्ञानिक सफाई का कार्य किया गया। उत्खनन में छोटे आकार के 7 मंदिर प्राप्त हुये, इनमे से 6 मंदिर में शिवलिंग मिले हैं। मंदिरों का संरक्षण / जिर्णोंध्दार किया गया है।

अनवेषण 2008-09 (Search)


राँची अंचल द्वारा सन 2008-09 में सराईकेला जिले के सुवर्ण रेखा नदी के तटपर इचा धरण ने सर्वे किया है। सर्वे के दौराण रघूनाथजी महाप्रभू मंदिर का निरीक्षण किया। मंदिर का निर्माण ईंट, चूना एवं सुरखी से किया गया, मंदिर का गर्भगृह लगभग 3.15 x 4.70 मीटर का है। मंदिर का निर्माण पिडा देऊल प्रकार का है, गर्भगृह में चित्रकारी है। मंदिर का निर्माण सण 1887 का है।

अनवेशण 2009-10


राँची अंचल द्वारा सन 2009-10 में साहिबगंज जिले में जामी मस्जीद/बारादरी के परिसर का सर्वे किया। सर्वे का प्रमुख उद्देश्य जामी मस्जिद के ईर्द-गिर्द के पुरातात्विक भवनों का अध्ययन तथा स्मारक घोषित करने के लिए महानिदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली को प्रस्ताव भेजना था। सर्वे के दौरान जैनाबाद मस्जिद, मिरजा मोहम्मद का मकबरा, इमलाबरीके दो मस्जिद, मैना बीबी का मकबरा एवं तालाब, जगतसेठ का टंकसाल, राँची का बिरसा मुंडा कारगृह का अध्ययण करके स्मारक घोषित करने के लिए प्रस्ताव, महानिदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली को भेजा गया है।

अनवेशण 2010-11


सन् 2010-11 में अंचल द्वारा रांची जिले के पिठोरिया स्थित श्वेताम्बरगढ़ का सर्वे किया गया। पहाडी के उत्तारी दिशा में टिले का निरीक्षण किया गया जो लगभग 200 x 150 मीटर का है, टिले की उचाँई 3 मीटर की है। टिले के उपरी भाग में लाल/काले रंग के मृदभांड के अवशेष बिखरे पड़े है, जो सातवी आठवी शताब्दी का संकेत देते है। मृदभांड में थाली, कटोरे, घड़े, लोटा, बडे आकार के घडे आदि प्रमूख है। टिले के उपर पुराना कुँआ है। पहाडी के पश्चिम दिशा में असूरा साईट (Meghalith) है, पहाडी के उपर कुछ नैसर्गिक गुफा है। पहाडी के पश्चिम दिशा में मंदिर के भग्नावशेष हैं। मंदिर परिसर में गणेश, शिव-पार्वती, हनुमान, घोडसवार एवं लिंग है।

सर्वे के दौरान पहाडी के पश्चिमी दिशा में लघुपाषाणकालीन अवशेष प्राप्त हुए है, जो चर्ट अगेट, चालसेडोनी, कारनेल्यिम पत्थर पर बनाए गये है। पिठोरिया गाँव में स्थानीय राजा का राजमहल है, जो आज खंडहर में पड़ा है। गाँव के परिसर में प्राचीन मस्जिद है, जो सतरहवीं षताब्दी का रहा होगा।

पश्चिम सिंहभूम जिले में बेनीसागर के पूर्वी दिशा में भगीया बेडा नाले के दाहीने तटपर लघुपाषाणकालीन अवशेषों की खोज की गई है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रांची अंचल द्वारा उपरोक्त गाँवों का 2011 में सर्वे किया गया, जिनका विवरण इस प्रकार है।

कबरा कला
कबरा कला गाँव रांची से उत्तारी दिशा में लगभग 251 मि.मी. पर स्थित है (अक्षांश 24°31’ देषांतर 83°54’)। कबरा कला गांव हैदर नगर पुलिस थाना जपला अंचल, जिला पलामू में स्थित है। जपला रेलवे स्टेशन से कबरा कला गाँव लगभग 18 कि. मीटर पर स्थित है। यह टिला सोन नदी के दाहिने तट पर अवस्थित है। सोन एवं कोयल नदी का संगम इसी स्थान पर है। टिले का परिसर लगभग 1000 x 500 मीटर का है तथा टिले की ऊँचाई जमीन से लगभग 10 मीटर की है। टिले के अधिकतर भाग में ग्रामिणों द्वारा कच्चे-पक्के मकान बनाये गये हैं। टिले के पूर्वी भाग में ग्रामीणों द्वारा खेती की जाती है। यहाँ से प्राप्त पुरावशेष ग्रामीण के पास देखने को मिलते हैं।

मृदभांड
सर्वे के दौरान टिले के उपरी भाग में भारी मात्रा में प्राचीन मृदभांड के अवशेष पाये गये है। मृदभांड से ज्ञान होना है कि कबरा कला गाँव ताम्र पाषाण काल से मध्य काल तक बसा है। मृदभांड में लाल, काले चमकीले NBP के प्रमाण अधिक है। टोटीदार कटोरे, बड़े आकार के मटके, हांडी, थाली छोटे मटके आदि प्रमुख है।

अवशेष
ग्रामीणों द्वारा बहुत बडी मात्रा में प्राचीन अवशेष प्राप्त किये गये हैं, जो उन्हीं ग्रामीणों के यहाँ रखे हुए है। यह अवशेष नव पाषाण युग से मध्यकाल का संकेत देते हैं। यहाँ से प्राप्त अवशेष निम्नलिखित है।

सिक्के
तांबे के आहन सिक्के, दिल्ली सल्तनत के तांबे के सिक्के, मुगलकालीन चाँदी के सिक्के, ब्रिटिश कालीन तांबे के सिक्के एवं रोमन आदि ग्रामीणों के पास सुरक्षित है।

चूडीयाँ
पत्थर, शीशा, पके मिट्टी की बनी चूडीयाँ (साधारण एवं अलंकृत) देखने को मिले हैं।

सिलिंग बॉल
पत्थर एवं पके मिट्टी के सीलिंग बॉल पाये गये हैं।

मटके
पके मिट्टी के मनके, पत्थर एवं चाल्सेडोनी अगेट जसपर, क्रिस्टल, कारनेलियन के मनके काफी मात्रा में टिले से प्राप्त हुए हैं।

पके मिट्टी से निर्मित मानव आकृति
पके मिट्टी से निर्मित मानव आकृति एवं भिन्न-भिन्न पशुओं की आकृतियाँ टिले से प्राप्त हुई है, उनमे से एक मिट्टी की मूर्ति उल्लेखनीय है। इस मूर्ति के दाहिने कान मे डमरू आकार की बाली प्रशंसनीय है।

मुहर
कबरा कला के ग्रामीणों द्वारा पत्थर के मुहर पाये गये हैं, जिनकी लंबाई 3 से.मी. है एवं छाप वर्गाकार है छाप पर जिरल उत्कीर्ण है।

कबला कला से प्राप्त पुरावशेषों से ज्ञान होना है कि यह बड़ा उन्नत उद्योग नगरी रहा होगा, जो सोन एवं कोयल नदी के संगम पर अवस्थित है। इसका व्यापारिक संबंध प्राचीन पाटलिपुत्र तथा अन्य नगरों से रहा होगा। कबरा कला, झारखंड का पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण स्थान है।